मताधिकार का प्रयोग कर आए एक मतदाता ने कहा, “विधानसभा का चुनाव शांतिपूर्वक निपट रहा है। लोग मतदान करके आए हैं। लोग बड़ी संख्या में घर से निकल रहे हैं। झारखंड के लिए सबसे बड़ा मुद्दा बालू है। बालू खनन का मुद्दा भी अहम है। लोग चाहते हैं कि खनन शुरू हो। कोई कहता है कि केंद्र सरकार ने शुरू नहीं किया, कोई राज्य सरकार को दोषी बताता है। लोग जानना चाहते हैं कि बालू खनन शुरू न होने के पीछे किसका हाथ है।”
दूसरे वोटर ने कहा, “पलामू को विकास की आवश्यकता है। यहां पर आपसी तालमेल की कमी और विकास दर का कम होना प्रमुख समस्याएं हैं। जिन उम्मीदवारों ने चुनाव जीतकर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है, उन्हें अपने इलाके के प्रति जिम्मेदारी निभानी चाहिए। जो लोग उन्हें वोट देते हैं, उनके लिए काम करना चाहिए और इलाके का विकास सुनिश्चित करना चाहिए। यदि स्थानीय नेताओं ने अपने क्षेत्र का सही तरीके से ध्यान रखा होता, तो पलामू का विकास कहीं अधिक होता। अब बदलाव की बयार चल रही है और लोगों में उम्मीद और उत्साह भी है। पिछले चुनावों में, जहां पहले वोट लेने के बाद क्षेत्रीय विकास पर ध्यान नहीं दिया गया, वहीं इस बार प्रशासन में बदलाव देखा जा रहा है, और जनता भी परिवर्तन की ओर देख रही है। 5 साल पहले चुनाव होते थे, लेकिन अब इस बार बदलाव की उम्मीद जताई जा रही है।”
मतदान करके आए एक अन्य मतदाता ने कहा, “कई योजनाओं और खर्चों का ऐलान किया गया है, जो सरकार द्वारा किए गए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनकी वास्तविकता कुछ और ही नजर आती है। उदाहरण के लिए, सड़क निर्माण की बात करें तो कई जगहों पर काम शुरू हुआ, लेकिन कुछ ही महीनों में वह काम अधूरा छोड़ दिया गया। इन समस्याओं की जिम्मेदारी लेने वाला कोई अधिकारी या ठेकेदार सामने नहीं आ रहा है। सरकार विकास के बड़े-बड़े दावे तो कर रही है, लेकिन जमीन पर उसकी गुणवत्ता कहीं नजर नहीं आती।”
उन्होंने आगे कहा, “एक और गंभीर मुद्दा यह है कि पिछले पांच वर्षों में जिन नेताओं की संपत्ति में भारी वृद्धि हुई है, वह लाखों-करोड़ों में हो रही है। एक कर्मचारी, जो 30,000 रुपये महीने की सैलरी पर काम कर रहा है, वह कैसे करोड़ों की संपत्ति और इमारतें बना लेता है? यह सवाल अब तक किसी के समझ में नहीं आया है। किस प्रकार का विकास हो रहा है, यह भी एक बड़ा सवाल है। अधिकारी, कर्मचारी और नेता जो शहरों में रह रहे हैं, उनके पास इतना पैसा कहां से आया? इस पर किसी भी प्रकार की जांच नहीं की जा रही है। करोड़ों रुपये का लेन-देन बिना किसी जांच के चलता रहता है। अगर किसी को भी पैसा मिलता है, तो वह सवाल उठने के बजाय चुपके से निपटा दिया जाता है। यह सिस्टम सही नहीं है। हमें यह समझना होगा कि अगर ऐसा हो रहा है, तो कहीं न कहीं कुछ गलत हो रहा है। यह स्थिति केवल लूट-खसोट तक सीमित नहीं है, बल्कि एक साजिश भी हो सकती है, जिसका सभी मिलकर फायदा उठा रहे हैं।”